मैं
नींद के आगोश मैं
,इस मोह जाल मैं,
नृप नरेश काल मैं ,
मंद मंद कोल्हाल मैं ,
देखता हूँ इस देश को ,
एक नए भेष को ,
हर तरफ अमन है ,
शांति काल परवल है ,
लोग खुशहाल है ,
हर तरफ िननाद ह,
देश पर्व हर और है
हर तरफ मनुष्य है
ये नया दृश्य है
मैं सुपन काल मैं हूँ
बर्तमान विदीप्त है ,
जल रहा मनुष्य है
लोग वेहाल है ,
लोग भयभीत है ,
हर तरफ कोल्हाल है
मैं देखता हूँविनाश को ,
राज रस रंग है ,
प्रजा वेप्रसंग है
कोई पहचानता नहीं
कोई जनता नहीं ,
मैं सोचता हूँ जाग कर ,
निद्राकाल त्याग कर ,
क्या ये बही देश है
क्या राज सो रहा
ये देश क्यों रो रहा ,
उठ खड़ा हो मनुष्य ,
बदल काल के इस वेग को,
सत्ता लोभ लोप हो ,हर तरफ ये जोर हो,
मेरी आन बान शान है ,
ये भारत देश महान है
Monday, July 18, 2011
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